CCUS क्या है? सरकार ने कार्बन कैप्चर और भंडारण पर ज़ोर दिया, नेट ज़ीरो 2070 का लक्ष्य
नीति आयोग और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) ने 27 अक्टूबर 2026 को CCUS यानी कार्बन कैप्चर, उपयोग और भंडारण को भारत के नेट ज़ीरो 2070 लक्ष्य का अहम हिस्सा बताया। इसका असर मुख्य रूप से बिजली, इस्पात, सीमेंट, रिफाइनरी, रसायन और उर्वरक जैसे उद्योगों पर पड़ता है, आम उपभोक्ताओं को तुरंत कुछ करने की ज़रूरत नहीं है।
आपके लिए इसका मतलब
यह ख़बर आम आदमी की रोज़मर्रा की ज़िंदगी से सीधे नहीं जुड़ी है। इसका मतलब है कि सरकार उन कारखानों और बिजलीघरों से निकलने वाली कार्बन डाइऑक्साइड को रोकने की तैयारी कर रही है जिन्हें आसानी से बंद या बदला नहीं जा सकता। आम लोगों को कोई फॉर्म नहीं भरना है और कोई तारीख़ नहीं है जिस तक कुछ करना हो।
मुख्य बातें
- CCUS का मतलब है कार्बन डाइऑक्साइड को कारखाने से निकलने से पहले पकड़ना, उसका इस्तेमाल करना या ज़मीन के नीचे सुरक्षित रखना।
- भारत का लक्ष्य 2070 तक नेट ज़ीरो उत्सर्जन है।
- केंद्रीय बजट 2026-27 में पाँच क्षेत्रों—बिजली, इस्पात, सीमेंट, रिफाइनरी और रसायन—के लिए पाँच वर्षों में 20,000 करोड़ रुपये की CCUS योजना घोषित हुई।
- अगस्त 2026 तक भारत की कुल बिजली क्षमता में जीवाश्म ईंधन आधारित स्रोतों की हिस्सेदारी 45.12% थी।
- मई 2026 में IIT बॉम्बे में भारत की पहली एकीकृत CCUS फील्ड प्रयोगशाला खुली, जो रोज़ 3 टन तक कार्बन डाइऑक्साइड पकड़ सकती है।
- ESTIC-2026 सम्मेलन 27-29 अक्टूबर 2026 तक भारत मंडपम, नई दिल्ली में हो रहा है।
CCUS क्या है
CCUS यानी कार्बन कैप्चर, उपयोग और भंडारण एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें कारखानों या बिजलीघरों से निकलने वाली कार्बन डाइऑक्साइड को हवा में जाने से पहले ही पकड़ लिया जाता है। इसके बाद उस गैस को साफ़ करके दबाव में भरा जाता है और आगे भेजा जाता है। पकड़ी गई गैस का इस्तेमाल किसी काम में किया जा सकता है या उसे ज़मीन के नीचे सुरक्षित रखा जा सकता है।
यह क्यों ज़रूरी बताया गया
भारत का लक्ष्य 2070 तक नेट ज़ीरो उत्सर्जन है। नवीकरणीय ऊर्जा से बहुत उत्सर्जन कम हो सकता है, लेकिन कुछ उद्योगों को बिजली से नहीं चलाया जा सकता, क्योंकि उनमें बहुत ज़्यादा तापमान या कोयले जैसे कार्बन वाले ईंधन की ज़रूरत होती है। नीति आयोग ने स्टील, सीमेंट, तेल एवं गैस, पेट्रोकेमिकल्स, रसायन और उर्वरक जैसे कठिन क्षेत्रों के लिए CCUS को अहम माना है।
प्रक्रिया कैसे चलती है
पहले चरण में कारखाने पर ही कार्बन डाइऑक्साइड पकड़ी जाती है और उसे साफ़, सूखा और दबाव में भरा जाता है। दूसरे चरण में इसे आमतौर पर पाइपलाइन से भेजा जाता है; लंबी दूरी के लिए जहाज़ जैसे साधन भी काम आ सकते हैं। तीसरे चरण में गैस का इस्तेमाल किया जाता है या उसे ज़मीन के नीचे स्थायी रूप से रखा जाता है।
कहाँ इस्तेमाल और कहाँ भंडारण
पकड़ी गई कार्बन डाइऑक्साइड का उपयोग एन्हांस्ड ऑयल रिकवरी, खाद्य एवं पेय पदार्थ, यूरिया, ग्रीन मेथनॉल और कंक्रीट जैसे कामों में हो सकता है। स्थायी भंडारण के लिए इसे समाप्त हो चुके तेल और गैस भंडार, गहरे लवणीय जलभृत या बेसाल्टिक चट्टानों जैसी भूगर्भीय संरचनाओं में गहराई तक भेजा जाता है।
हब और क्लस्टर मॉडल
भारत का CCUS ढाँचा ऐसे क्षेत्रीय क्लस्टर और हब बनाने की बात करता है जिनमें कई कारखाने एक साझा व्यवस्था से जुड़ें। इससे परिवहन, उपयोग और भंडारण की सुविधाएँ साझा हो सकती हैं। DST का CCUS रोडमैप 2025 गुजरात तट, ओडिशा-झारखंड बेल्ट और पूर्वोत्तर भारत जैसे संभावित क्षेत्रों की पहचान करता है।
सरकार की पहलें
केंद्रीय बजट 2026-27 में बिजली, इस्पात, सीमेंट, रिफाइनरी और रसायन क्षेत्रों के लिए पाँच वर्षों में 20,000 करोड़ रुपये की CCUS योजना घोषित हुई। मई 2026 में IIT बॉम्बे में भारत की पहली एकीकृत CCUS फील्ड प्रयोगशाला खुली, जो रोज़ 3 टन तक कार्बन डाइऑक्साइड पकड़ सकती है। इसके अलावा 27-29 अक्टूबर 2026 तक भारत मंडपम, नई दिल्ली में ESTIC-2026 सम्मेलन हो रहा है, जिसमें CCUS जैसी उभरती तकनीकों पर चर्चा होगी।
आम लोगों के लिए इसका क्या मतलब है
यह मामला सीधे आम उपभोक्ता से नहीं जुड़ा है। इसमें न कोई आवेदन है और न कोई तारीख़ जिस तक कुछ करना हो। यह जानकारी उद्योग, शोध और पर्यावरण से जुड़े लोगों के लिए ज़्यादा काम की है।
सवाल-जवाब
CCUS क्या है?
CCUS का पूरा नाम कार्बन कैप्चर, उपयोग और भंडारण है। इसमें कारखानों से निकलने वाली कार्बन डाइऑक्साइड को हवा में छोड़ने से पहले पकड़ा जाता है, फिर उसका किसी काम में इस्तेमाल किया जाता है या ज़मीन के नीचे सुरक्षित रखा जाता है।
क्या आम लोगों को CCUS के लिए कुछ करना है?
नहीं। यह सरकार, अनुसंधान संस्थानों और उद्योगों के लिए बनाई गई व्यवस्था है। आम नागरिकों के लिए इसमें कोई आवेदन या तारीख़ नहीं दी गई है।
CCUS किन उद्योगों के लिए ज़रूरी बताया गया है?
नीति आयोग ने स्टील, सीमेंट, तेल एवं गैस, पेट्रोकेमिकल्स, रसायन और उर्वरक जैसे कठिन क्षेत्रों के लिए CCUS को अहम बताया है। इन उद्योगों में उत्सर्जन कम करना आसान नहीं माना जाता।
CCUS के लिए बजट में क्या घोषणा हुई?
केंद्रीय बजट 2026-27 में बिजली, इस्पात, सीमेंट, रिफाइनरी और रसायन क्षेत्रों में CCUS को बढ़ावा देने के लिए पाँच वर्षों में 20,000 करोड़ रुपये आवंटित किए गए।
भारत का नेट ज़ीरो लक्ष्य कब है?
भारत का लक्ष्य वर्ष 2070 तक शुद्ध शून्य उत्सर्जन यानी नेट ज़ीरो है। CCUS को इस लक्ष्य को पूरा करने का एक सहायक रास्ता बताया गया है।
स्रोत: PIB, "कार्बन कैप्चर, उपयोग और भंडारण", 27 अक्टूबर 2026. मूल सूचना देखें
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